
कवर्धा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार चाहे जितने दावे कर ले, लेकिन हकीकत तहसील दफ्तर से लेकर एसडीएम कार्यालय तक कुछ और ही कहानी बयान करती है। कवर्धा तहसील में पिछले 10 वर्षों से जमे एक बाबू ने पूरे सिस्टम को अपनी जेब में बंद कर रखा है। कभी तहसीलदार का बाबू, कभी एसडीएम का बाबू और अब अभी डायवर्सन में बाबू है में शाखा में पदस्थ होकर ‘कमाई का नया अड्डा’ बना लिया है।
10 साल का एकछत्र साम्राज्य
कवर्धा में आम जनता का साफ आरोप – “फाइल तभी चलती है, जब नोट चलते हैं!” डायवर्सन, नामांतरण, नक्शा, खसरा, भू-अधिकार, किसी भी फाइल का आगे बढ़ना इस बाबू की इजाजत पर निर्भर। दफ्तर आने वालों को यह तक कहा जाता है –
“यदि सिस्टम समझ में नहीं आता, तो दलाल से बात कर लो।” यानी भ्रष्टाचार अब खुले आम के चल रहा हैसाथ ‘सर्विस पैकेज’ में मिलने लगा है।
डायवर्सन का नया टैरिफ कार्ड सूत्र बताते हैं कि भूमि डायवर्सन के लिए न्यूनतम रेट 20 से 50 हजार देरी के लिए अतिरिक्त ‘फॉलोअप शुल्क’।और जल्द फाइल आगे बढ़ानी हो तो प्राइम सर्विस चार्ज यानी सरकारी दफ्तर नहीं, मानो ‘ऑफिशियल कैश काउंटर’!
सरकार मौन पर प्रश्नचिह्न
शिकायतें जिलाधीश से लेकर राजस्व मंडल तक, वर्षों से दर्ज। लेकिन कार्रवाई? शून्य। क्यों? क्या कारण है कि एक बाबू 10 साल तक एक ही तहसील में जमे हुए , क्या ‘ऊपर तक सेटिंग’ का खेल इतना मजबूत है कि सरकार भी आंख मूंदकर बैठी है?
दबंगई और नेटवर्क इस बाबू के दफ्तर में दलालों की स्थायी टीम।।किसी की फाइल रुकी? जवाब— “ऊपर जाकर बात करो” किससे ऊपर? यह वही रहस्य है जिससे पूरा जिलास्तर प्रशासन पहले से वाकिफ है पर अंजान बनने का अभिनय जारी है।
जनता का सवाल
क्या बिना पैसे सरकारी दफ्तरों में साधारण नागरिक का काम होना अब सपना है? कब तक ऐसे ‘10 सालों के दाढ़ जमाए बाबू’ कार्यालय को निजी दुकान बनाए रखेंगे? क्या सरकार की कथित भ्रष्टाचार विरोधी मंशा सिर्फ भाषणों तक सीमित है?
समाप्ति नहीं, शुरुआत कवर्धा तहसील के इस बाबू राज ने प्रशासन की साख तोड़ी है। जनता न्याय और कार्रवाई की मांग कर रही है— या तो स्थानांतरण करो, या निलंबन करो, नहीं तो कबीरधाम में भ्रष्टाचार को ‘अधिकार’ मान लिया जाएगा।





