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मनरेगा नियमों की खुलेआम अनदेखी:पंडरिया जनपद में चेक डेम निर्माण बना मनमानी का केंद्र, मशीनों के उपयोग से मजदूर बेरोज़गार,जिलाधिकारी की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल

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कवर्धा/पंडरिया। ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन के उद्देश्य से लागू महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कबीरधाम जिले में अपनी मूल भावना से भटकती दिखाई दे रही है। जनपद पंचायत पंडरिया के ग्राम पंचायत खरहट्टा के आश्रित ग्राम केसलमरा में चेक डेम निर्माण कार्य के दौरान मशीनों के अनियमित उपयोग, मजदूरों को रोजगार व मजदूरी से वंचित रखने तथा निर्माण सामग्री में भारी अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन गतिविधियों से न केवल मनरेगा के नियमों की खुली धज्जियाँ उड़ रही हैं, बल्कि जिला प्रशासन की निगरानी प्रणाली भी सवालों के घेरे में है।

श्रम-प्रधान योजना में मशीनों की धड़ल्ले से चल रही ‘सर्विस’

मनरेगा दिशा-निर्देशों के अनुसार योजना का हर कार्य श्रम-प्रधान होना चाहिए, जिसमें मजदूरों की भागीदारी अधिकतम हो और मशीनों का उपयोग पूर्ण रूप से प्रतिबंधित रहे। इसके बावजूद केसलमरा में चेक डेम निर्माण में जेसीबी व अन्य मशीनों के उपयोग की शिकायत लगातार मिल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि मशीनें चलने से मजदूरों के हाथ काम से खाली हो गए हैं और 100 दिनों के गारंटीड रोजगार का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

मजदूरी भुगतान नहीं, मजदूरों का हक अधर में

योजना के तहत मजदूरी का भुगतान 15 दिनों के भीतर होना चाहिए, लेकिन ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि मजदूरों को न तो नियमित रूप से काम मिल रहा है और न ही मजदूरी। श्रमिकों ने बताया कि कई बार उपस्थिति दर्ज कराने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ है। इससे मजदूर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।

निर्माण सामग्री में अनियमितता—गुणवत्ता पर गंभीर खतरा

चेक डेम निर्माण स्थल पर निर्माण सामग्री की भारी कमी दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों ने बताया कि सामग्री को सरपंच के निवास स्थान से मिलर मिर्च मशीन मिलाकर निर्माण स्थल तक पहुंचाया जा रहा है। वहीं लोकल हाफ नदी की मिट्टी युक्त रेत का उपयोग किया जा रहा है, जो तकनीकी मानकों के विरुद्ध है और निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

ग्राम पंचायत में मिलीभगत के आरोप, नियम बने मज़ाक

ग्रामीणों ने सरपंच, संबंधित अधिकारियों और तकनीकी सहायक पर मिलीभगत का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मशीनों का खुलेआम उपयोग,मजदूरों को रोजगार व मजदूरी से वंचित करना,घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल,निरीक्षण और निगरानी का अभाव,यह सब भ्रष्टाचार और मनरेगा के मूल उद्देश्य से खिलवाड़ का प्रमाण है।

जिलाधिकारी की निगरानी पर उठे सवाल

मनरेगा की निगरानी का दायित्व जिला प्रशासन पर होता है, लेकिन केसलमरा में हो रही अनियमितताओं से स्पष्ट है कि निरीक्षण और नियंत्रण व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि उच्च अधिकारियों द्वारा समय-समय पर वास्तविक निरीक्षण न होने से सरपंच और कर्मचारी मनमानी पर उतारू हैं।

ग्रामीणों ने की उच्च स्तरीय जांच की मांग

गांव के लोगों ने बताया कि वे इस पूरे मामले की शिकायत जिला कलेक्टर और सीईओ जिला पंचायत से करेंगे। उनका कहना है कि जब तक निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक मनरेगा का लाभ गरीब मजदूरों तक नहीं पहुंचेगा।

मनरेगा के नियम जिन्हें नज़रअंदाज़ किया गया

100 दिन का गारंटीड रोजगार,मजदूरी का 15 दिनों में भुगतान,मशीनों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध,श्रम–सामग्री अनुपात 60:40,कार्य स्थल 5 किमी के दायरे में,सोशल ऑडिट अनिवार्य सहित मास्टरलरोल सार्वजनिक होना होता है।

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