
राज्य में लागू की गई नई भूमि मूल्यांकन गाइडलाइन ने खरीदारों, विक्रेताओं और रियल एस्टेट से जुड़े सभी वर्गों में गहरी चिंता पैदा कर दी है। कई जिलों में जमीन के दामों में अचानक हुई 200 से 800 प्रतिशत तक की वृद्धि ने आमजन के सपनों पर मानों एक बोझ डाल दिया है।
सरकार ने इस संशोधित गाइडलाइन को राजस्व संग्रह बढ़ाने और बाजार मूल्य के अनुरूप बनाने की दलील दी है, परंतु जमीनी हकीकत यह बताती है कि इससे आम लोगों की पहुंच से जमीन और मकान और भी दूर हो रहे हैं।
क्या है नई व्यवस्था?
नई गाइडलाइन के तहत जमीन का मूल्यांकन कई कस्बों, नगरों और ग्रामीण इलाकों में नए सिरे से किया गया है। जिन क्षेत्रों में हाल के वर्षों में जनसंख्या, व्यावसायिक गतिविधियों और सुविधाओं का विकास हुआ, वहां रजिस्ट्रेशन मूल्य में भारी उछाल दर्ज किया गया।
उदाहरण के तौर पर— कई ग्रामीण इलाकों में प्रति हेक्टेयर की कीमत ₹1 लाख से बढ़कर ₹6 से ₹8 लाख तक पहुंच गई। शहरी और व्यावसायिक क्षेत्रों में यह बढ़ोतरी 100% से लेकर 800% तक दर्ज की गई है।
बढ़े हुए रजिस्ट्री शुल्क का असर
जमीन के दाम बढ़ने का सीधा असर सिर्फ खरीददार पर नहीं, बल्कि पूरे रियल एस्टेट सेक्टर पर पड़ रहा है— रजिस्ट्री शुल्क और स्टाम्प ड्यूटी भी बढ़े मूल्य के आधार पर लगेगी। आम घर बनाने वालों को अब लोन लेना और कठिन होगा। छोटे प्रॉपर्टी डीलर, बिल्डर और निवेशक भी इस बदलाव से प्रभावित होंगे। यह स्थिति ग्रामीण और निम्न आय वर्ग वालों के लिए चुनौती बन गई है, जिनके लिए जमीन जीवनभर की पूंजी का सपना होती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि— “अचानक इतनी बढ़ोतरी बाजार में ठहराव ला सकती है। जमीन का मूल्य वास्तविक मांग और क्रय क्षमता को देखकर तय होना चाहिए।”
वहीं आम नागरिकों का कहना है कि— “हम पहले ही महंगाई और रोजमर्रा के खर्चों से जूझ रहे हैं। अब जमीन खरीदना और भी मुश्किल हो गया है।”
सरकार के इरादे और ज़मीनी प्रश्न , हालांकि सरकार का तर्क है कि भूमि मूल्य वर्षों से अपडेट नहीं थे और यह कदम विकास, निवेश और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए जरूरी था।
परंतु सवाल यह उठता है कि—
✔ क्या यह बदलाव क्रमिक और संतुलित नहीं होना चाहिए था?
✔ क्या सरकार ने इस निर्णय से पहले जनता और विशेषज्ञों से विस्तृत संवाद किया?
✔ क्या गरीब और मध्यम वर्ग के लिए विशेष रियायत या वैकल्पिक नीति की व्यवस्था हो सकती है?
पुनर्विचार क्यों जरूरी?
इस निर्णय की सबसे बड़ी चिंता यह है कि— जमीन की रजिस्ट्री पर रोक बढ़ेगी , बाजार में नकद लेन-देन और अवैध सौदे बढ़ सकते हैं , आवासीय निर्माण धीमा पड़ सकता है , आवास योजनाओं की गति प्रभावित हो सकती है
यही वजह है कि कई सामाजिक संगठनों, स्थानीय निकायों, नागरिक समूहों और रियल एस्टेट प्रतिनिधियों ने मांग की है कि सरकार इस गाइडलाइन पर पुनर्विचार करे या कम से कम इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करे।
भूमि मूल्य निर्धारण जरूरी है, लेकिन इसका उद्देश्य जनता के हितों, सामाजिक न्याय और आर्थिक संतुलन के अनुरूप होना चाहिए। अगर जमीन आम आदमी की पहुंच से दूर होती गई, तो “सबके लिए आवास” जैसे लक्ष्य सिर्फ कागजों पर ही रह जाएंगे।
अब समय है— नए मानकों पर चर्चा, समीक्षा और व्यावहारिक समाधान तलाशने का।





