
अजय जांगड़े
कवर्धा।
कबीरधाम जिले में बाल श्रम निषेध कानूनों का पालन केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहा है। जिले के चारों विकासखंडों में संचालित अनेक और ज्यादातर कार्यरत संस्थानों—भोजनालयों, होटल-ढाबों, स्वीट्स दुकानों, वर्कशॉप, फेब्रिकेशन यूनिट्स और वैध अवैध कबाड़ दुकानों सहित अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बाल श्रम निषेध से संबंधित अनिवार्य सूचना पटल (नोटिस बोर्ड) तक प्रदर्शित नहीं किए गए हैं। यह स्थिति न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि प्रशासनिक निगरानी की विफलता को भी उजागर करती है।
जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि जहां कानून स्पष्ट रूप से सूचना पटल प्रदर्शित करने और बाल श्रम पर सख्त रोक की बात करता है, वहीं हकीकत में अधिकांश संस्थानों में इन नियमों का कोई अस्तित्व तक दिखाई नहीं देता। सवाल यह उठता है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी किस आधार पर “संतोषजनक” रिपोर्ट पेश कर रहे हैं?
“अभियान” सिर्फ फाइलों में, हकीकत में शून्य कार्रवाई
बाल एवं किशोर श्रम उन्मूलन के नाम पर चलाए जा रहे अभियान की जमीनी समीक्षा लगभग नदारद है। निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों की सक्रियता संदेह के घेरे में है। यदि जिले के अधिकांश संस्थानों में अनिवार्य सूचना पटल तक नहीं लगे हैं, तो यह साफ संकेत है कि या तो निरीक्षण हो ही नहीं रहे, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं।
अच्छे प्रशासन के दावों पर करारा सवाल
सरकार और प्रशासन जहां “सुशासन” और “बाल संरक्षण” के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं कबीरधाम की यह स्थिति उन दावों पर सीधा तमाचा है। क्या अच्छे प्रशासन का मतलब केवल बैठकों और रिपोर्टों तक सीमित रह गया है? क्या जमीनी सच्चाई देखने की जिम्मेदारी अब किसी की नहीं बची?
शिक्षा और भविष्य दोनों खतरे में
बाल श्रम की अनदेखी का सबसे बड़ा नुकसान बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। जब बच्चे मजदूरी में उलझते हैं, तो शिक्षा से उनका नाता टूट जाता है। यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के विकास पर सीधा हमला है।
अब भी नहीं चेता प्रशासन तो हालात होंगे और भयावह
जरूरत है कि प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति से बाहर निकलकर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई करे।
सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अनिवार्य सूचना पटल तत्काल प्रदर्शित कराए जाएं
नियमित और औचक निरीक्षण कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो
बाल श्रम उन्मूलन अभियान की वास्तविक जमीनी समीक्षा सुनिश्चित की जाए
यदि इसके बावजूद भी जिम्मेदार अधिकारी मौन बने रहते हैं, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में सबसे बड़ी बाधा खुद सिस्टम ही बन चुका है।





