
अजय जांगड़े 8085164784
कवर्धा।छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर प्रतीकों की भाषा चर्चा में है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता डॉ. रमन सिंह के गृहनगर में स्थापित होने जा रहे मेडिकल कॉलेज के भूमिपूजन कार्यक्रम में ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने राजनीतिक हलकों से लेकर आम जनता तक को सोचने पर मजबूर कर दिया। 15 वर्षों तक प्रदेश की सत्ता संभालने वाले, जिनके नाम पर कभी छत्तीसगढ़ में भाजपा की राजनीति आकार लेती थी, उन्हीं डॉ. रमन सिंह का नाम भूमिपूजन शिलालेख में दर्ज न होना अब महज एक प्रशासनिक चूक से कहीं अधिक माना जा रहा है। खास बात यह रही कि यह कार्यक्रम स्वयं डॉ. रमन सिंह की मौजूदगी में सम्पन्न हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम भाजपा की बदलती राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व संरचना की ओर संकेत करता है। पार्टी अब प्रदेश में नई नेतृत्व-छवि गढ़ने और भविष्य की राजनीति को नए चेहरों के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। ऐसे में पुराने और अनुभवी नेताओं की भूमिका को सीमित करने का संदेश इस तरह के प्रतीकात्मक निर्णयों के माध्यम से दिया जा रहा है।
डॉ. रमन सिंह का कार्यकाल स्वास्थ्य, शिक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और आधारभूत ढांचे के विस्तार के लिए जाना जाता है। मेडिकल कॉलेज जैसी संस्थाओं की परिकल्पना और आधार उन्हीं के शासनकाल में तैयार हुआ था। ऐसे में उनके योगदान को शिलालेख से बाहर रखना राजनीतिक मर्यादा और कृतज्ञता को लेकर भी सवाल खड़े कर रहा है।
स्थानीय नागरिकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कई लोग इसे भाजपा की ‘संगठन सर्वोपरि’ नीति से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ इसे वरिष्ठ नेतृत्व को हाशिये पर ले जाने की प्रक्रिया का संकेत मान रहे हैं।
बहरहाल, यह मामला केवल एक नाम के न होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की राजनीति में बदलते सत्ता-संतुलन और नेतृत्व की नई परिभाषा को उजागर करता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस संदेश को किस रूप में आगे बढ़ाती है और इसका राजनीतिक असर प्रदेश की राजनीति पर कितना गहरा पड़ता है।





